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अमेरिकन कंपनी में मोशन ग्राफिक्स स्पेशलिस्ट हैं




हीमोफीलिक होने से स्कूल ने एडमिशन से मना कर दिया था, मां ने 3 साल घर पर पढ़ाया, अब संर्घष कर हिमोफीलिकों के लिए फ्री इंजेक्शन करवाने में दिया सहयोग
अमेरिकन कंपनी में मोशन ग्राफिक्स स्पेशलिस्ट हैं
धर्मेन्द्र डागर | नई दिल्ली
जमीन पर पहला कदम रखते ही हीमोफीलिया जैसी घातक बीमारी ग्रस्त अमित इससे पहले अपने 3 भाईयों काे इस बीमारी से खो चुके हैं। अमित सेन (27) खुद हीमोफीलिया से पीड़ित है और अब एक अमेरिकन कंपनी में मोशन ग्राफिक्स स्पेशलिस्ट के तौर पर काम करते हुए सामान्य जीवन जी रहे हैं। वह दूसरे हीमोफीलिक पेशंट्स की भी मदद करते हैं।
जमीन पर पहला कदम रखते ही हीमोफीलिया जैसी घातक बीमारी ग्रस्त अमित इससे पहले 3 भाईयों काे इस बीमारी से खो चुके हैं
1200 से ज्यादा रोगियों को नुक्कड़ नाटक, वीडियो बनाकर तथा सोसायटियों में जाकर तथा कैरियर गाइडेंस एंड ट्रेनिंग दे चुके हैं
हीमोफीलिया के बारे में लोगों को जागरूक करते अमित के साथी।
अखबार में आए आर्टिकल से बची थी अमित की जिंदगी
अमित सेन ने बताया कि वह मूलत: राजस्थान के झुंझनु इलाके के निवासी हैं, लेकिन अब अपनी मां और 2 बहनों के साथ दिल्ली में रहते हैं। वह पैदाइश से हीमोफीलिया के शिकार हो गए थे। पहले भी उनके 3 भाइयों की जान इस बीमारी से चली गई थी। मां को उन्हें खोने का हमेशा ही डर लगा रहता था। जब वह 3 माह के थे तब उनकी मां ने एक अखबार में हिमोफीलिया पर आर्टिकल पढ़ा। पढ़ते ही वह बहुत खुश हुई कि इस बीमारी का इलाज हो सकता है। वह अमित को लेकर दिल्ली आईं।
और जब स्कूल ने एडमिशन देने से किया मना…
अमित ने बताया कि जब वह 5 साल के थे तो मां एक स्कूल में एडमिशन कराने गईं। हीमोफीलिया का पता चलते ही स्कूल ने एडमिशन से मना किया। मां ने उन्हें घर पर पढ़ाया। जब 8 साल के हुए तब फिर एडमिशन के लिए गए। स्कूल ने तीसरी क्लास में एडमिशन दिया। अमित को अमेरिका के एक हीमोफीलिया प्रोग्राम को अटैंड करने का मौका मिला, जिसकी ट्रेनिंग उन्हें जर्मनी में मिली। हीमोफीलिया के एक प्रोजेक्ट पर काम किया और 13 देशों के बेहतरीन प्रोजेक्ट्स में से पुरस्कर मिला।
हीमोफीलिया|वो सब कुछ जो आप जानना चाहते हैं
हीमोफीलिया बीमारी 2 तरह की होती है-हीमोफीलिया ए और हीमोफीलिया बी। यह अनुवांशिक बीमारी है। इसमें शरीर में रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है, चोट लगने पर रक्त स्राव नहीं रुकने पर मरीज की मौत हो जाती है। यह बीमारी 5 हजार बच्चों में से एक को होती है।
5 से 20 हजार रुपए का है इंजेक्शन
हीमोफिलिया का इंजेक्शन मरीज के वजन के हिसाब से लगाया जाता है। एक बच्चे को यह इंजेक्शन कम से कम 5 हजार रु. व अधिक से अधिक 20 हजार रु. का होता है। यह इंजेक्शन शरीर के किसी भी पार्ट में रक्तस्राव होने पर लगाया जाता हैै।
तीन अस्पतालों में फ्री कराए इंजेक्शन
1998 में अमित हीमोफीलिया सोसाइटी दिल्ली से जुड़ कर दिल्ली के 3 बड़े अस्पताल लोक नायक जयप्रकाश नारायण, दीन दयाल उपाध्याय और गुरु तेग बहादुर में इंजेक्शन को फ्री करवाने में अग्रणी भूमिका निभाई।
अमित ने कोर्ट में पीआईएल डाली जिसके लिए देशभर के मरीजों का डाटा जुटाया। कोर्ट ने इन्हीं की पीआईएल पर आदेश दिया कि 2 तरह के इंजेक्शन फ्री किए जाएं। आदेश पर 3 अस्पतालों को लेकर मरीजों में जागरूकता फैलाई।
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